मरने के बाद के जीवन की अनुभूतियाँ – स्वर्ग-नरक की सच्चाई

मरणोपरांत जीवन के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष अनुभवों के उदाहरणों से परिपूर्ण ‘Life After Life‘ पुस्तक के लेखक डा. रेमन्ड इ. मूडी हैं। जिन्होंने 50 ऐसे व्यक्तियों के अनुभवों को इस पुस्तक में संग्रहीत किया है। जिन्हें डॉक्टरों ने मृतक घोषित कर दिया था।  किन्तु थोड़ी देर बाद वह पुनः जीवित हो उठे।  स्वर्गीय अनुभवों से युक्त इस पुस्तक के कई बार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।

feeling of life after death

रिमांड इ. मूडी जब वर्जोनिया विश्व विद्यालय में छात्र थे तब उनके एक मनोविज्ञान के प्रोफेसर ने बताया की अपनी बीमारियों के दौरान वह दो बार मर चुके हैं। उनके कथन को लेखक ने टेपरिकार्ड कर लिया था। उनके अनुसार मृत्यु के बाद महाशांति प्राप्त होती है।

लेखक जब कारोलिना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक था। तब उसके एक छात्र ने अपनी दादी की मृत्यु के बाद पुनः जीवित हो उठने की बात बताई।  जिसमें मृत्यु के बाद अंधेरी गुफा, घंटियों की आवाज, महाप्रकाश व पितरों की आत्मा से साक्षात्कार की बात उस महिला ने स्वीकार की थी।

 

 

एक व्यक्ति जिसकी चोट लगने से अचानक मृत्यु हो गयी थी और थोड़ी देर बाद वह पुनः जीवित हो उठा। उसने अपना अनुभव बताया – “चोट की वजह एक क्षण के लिए दर्द महसूस हुआ और फिर सारा दर्द गायब हो गया।  मुझे ऐसा महसूस हुआ की मैं अंधकार में उड़ा जा रहा हूँ।  यद्यपि शीत ऋतु थी फिर भी अन्धकार में तैरता हुआ गर्मी और दिव्यतम सुख का अनुभव किया। ”

शारीरिक पीड़ा के असह्य होते ही डाक्टरों द्वारा मृत घोषित एक व्यक्ति ने जीवित होने के बाद बताया की उसे यह शरीर छोड़ते ही नए किस्म का शरीर मिल गया था। उसने घंटियों की आवाज सुनी, अँधेरी सुरंग में जाने और बाद में अपने पूर्व मित्रों व पितरों से मिलने की बात कही।  उस व्यक्ति ने यह भी बताया की उसने अपने पूर्व मृत पितरों के साथ एक दिव्य प्रकाश युक्त आत्मा को देखा जिसमे प्यार और ममता का निर्झर बह रहा था।  इस प्रकाश ने उसके पूर्व जीवन में घटित घटनाओं अर्थात कार्यों का नक्शा दिखाया।  उस दिव्य वातावरण से वह लौटना भी न चाहता था किन्तु अचानक उसे अपने इस जीवन का स्मरण हो आया और वह जीवित हो उठा।  उसने बताया की उस अलौकिक वातावरण का वर्णन वाणी से करने में असमर्थ है।

मृत घोषित होने के बाद पुनः जीवित होने वाली एक महिला ने बताया की — “मैंने अखंड शान्ति, परम आनंद और सुख के अलावा अपने मृत्यु काल में और कुछ भी नहीं महसूस किया। ”

वियतनाम युद्ध में गोली लगने से मरा और बाद में जीवित होने वाले सैनिक ने बताया की — “गोली लगते ही मैंने परमशान्ति और राहत की सांस ली।  मुझे कुछ भी कष्ट नहीं हुआ। इसके पूर्व इससे ज्यादा सुख मैंने कभी नहीं महसूस किया था। ”

एक मृत व्यक्ति ने बताया की मैंने मरते समय पाया की एक ऐसी सीमा रेखा पर पहुँच गया हूँ जहां पर दिव्य प्रकाश पुंज के रूप में एक आत्मा मिली उसने बड़े ही प्रेम  से , ममता व अपनत्व का परिचय दिया।  साथ ही वहां पर व्याप्त दिव्य प्रकाश को देख सकने की क्षमता प्रदान की।  इस प्रकाश पुंज आत्मा ने उसके जीवन में किये कार्यों से सम्बंधित नाना प्रकार के प्रश्न भी किये।

एक व्यक्ति का अनुभव है की मरने के बाद उसने अपने को एक हरे रंग के प्रकाश युक्त मैदान में उड़ते देखा।  उस मैदान के पार एक चहार दीवारी है उसके उस पार एक दिव्य ज्योति पुंज व्यक्ति उसे लेने आ रहा था।

एक व्यक्ति ने बताया की उसने भूरे रंग के कुहरे में अपने को उड़ते देखा था। उसके पार धरती के निवासियों के समान इंसान थे।  वहां पर बड़ी-बड़ी इमारतें व रोशनियां जगमगा रही थीं।  वहां पर उसने कई वर्ष पूर्व मरे चाचा कार्ल को भी देखा।  उसके चचा ने उसे पुनः धरती पर भेज दिया था।

 

 

इसके विपरीत जिनने  निराशा, दुर्बुद्धि एवं दुष्टता से घिरी मनःस्थिति एवं परिस्थिति में जीवन गुजारा है उन पर इसी स्तर के स्वप्न मरणोत्तर जीवन में छाये रहते हैं।  यह अपना रचा नरक है जो जीवित रहते भी दीखता है और शरीर छोड़ने के उपरान्त भी।  स्वर्ग और  अपने इसी संस्कार की तरह अदृश्य प्रगति का कोई घटक हो सकता है पर इसमें किस द्वार  प्रवेश किया जाय यह पूर्णतया अपनी ही आदतों पर निर्भर रहता है।

उपरोक्त शोध में ऐसे उत्तर भी मिले हैं जिनसे प्रतीत होता है की मारने के बाद का समय डरावना भी होता है और नीरस तथा कष्टकारक भी।  इसी स्थिति का विवेचन कोई चाहे तो नरक की विभीषिकाओं के साथ भी संगति बिठा सकता है।

एक व्यक्ति का अनुभव है की जैसे ही वह मरा वह एक अंधकार युक्त  सुरंग में पहुँच गया।

एक दूसरे का कहना है की मर कर वह सर्वप्रथम एक अन्धकार युक्त सिलिंडर में पहुँच गया।

एक मृतक व्यक्ति ने जीवित होने पर बताया की मेरे मस्तिष्क में  की बुरी  भन-भनाहट सुनायी पड़ रही थी , मैं उससे बेचैन हो उठा।  उस दृश्य को कभी नहीं भूल सकता।

 मरने के बाद भी जीवात्मा अपने मृत शरीर के इर्द-गिर्द मंडलाता रहता है और उसका अस्तित्व बने रहने तक उसके समीप ही बना रहता है।  इसलिए स्वजनों द्वारा मृत शरीर को जल्दी ही समाप्त करने का प्रयत्न किया जाता है।  इस दृष्टि से शरीरों को बहुत समय  सुरक्षित रखने का प्रयास अनुपयुक्त प्रतीत होता है।  संबंधी लोग मोह वश उसकी स्मृति को बनाये रहने के लिए अवशेषों की रक्षा भी करते पाए जाते हैं पर मृतात्मा को शांति और सद्गति की दृष्टि से यही उचित है की उसका मोह मृत शरीर से छूट सके ऐसा प्रयत्न किया जाय।  उसी में उसके शोक की निवृत्ति और भावी प्रगति का पथ-प्रशस्त होता है।

एक व्यक्ति ने बताया की वह जल में डूब कर मर गया था।  मरने के बाद उसकी आत्मा जलाशय से 4-5 फुट ऊंचाई पर रूक गईं और वहीँ से अपने शरीर को डूबते उतराते देखा था।  उस समय वह अपने को अत्यंत हल्का महसूस कर रहा था।

एक मृतक महिला ने बताया की मरते ही मैं तैरते-तैरते धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी।  कोडपिन्क , कोडपिन्क के नर्सों की आवाज सुनी और देखा की 10-12 नर्से उसके शरीर को घेर कर खड़ी हैं।  डॉक्टर को बुलाया गया।  मैंने डॉक्टर को अपने कमरे में प्रवेश करते देखा था।  मैं छत तक पहुँच कर रूक गईं और वहां से यह कौतुक देखती रही।  मैं स्वयं को अत्यंत हल्की-फुल्की महसूस कर रही थी।  डॉक्टरों के आदेशानुसार जैसे ही डिफी ब्रिलेटर मशीन द्वारा मेरे शरीर को झटके दिए गए मैंने सारे शरीर को उछलते पाया, हड्डियों में दर्द हुआ।  मैं पुनर्जीवित हो गयी।

 

 

हर जन्म लेने वाले का मरण निश्चित है, मरण के उपरान्त जीवन का क्रम भी दिन और रात्रि की तरह चलता रहता है।  इसका मध्य काल कैसे बिताता है इसका कुछ आभाश उपरोक्त अनुभवों से मिलता हैं जो थोड़े समय तक मृत्यु की गोद में रहने के बाद वापिस लौटे और अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करने में समर्थ रहे।

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